0 बार पढ़ा गया
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
समाज की वृद्धि करने का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (सुयुजः) सुयोग्य (इन्द्रः) प्रतापी पुरुष (स्वाहा) सुन्दर वाणी से (बहुधा) अनेक प्रकार (वीर्याणि) अपने वीर कर्मों को (अस्मिन्) इस (यज्ञे) परस्पर मेल में (युनक्तु) लगावे ॥११॥
भावार्थभाषाः - विद्वान् उत्साही पुरुष समाज की उन्नति में सदा प्रयत्न करता रहे ॥११॥
टिप्पणी: ११−(इन्द्रः) प्रतापी पुरुषः (वीर्याणि) वीर-यत्। वीरकर्माणि ॥ ०५।०२६।१२ ॥
