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इन्द्रो॑ युनक्तु बहु॒धा पयां॑स्य॒स्मिन्य॒ज्ञे सु॒युजः॒ स्वाहा॑ ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

इन्द्र: । युनक्तु । बहुऽधा । वीर्याणि । अस्मिन् । यज्ञे। सुऽयुज: । स्वाहा ॥२६.११॥

अथर्ववेद » काण्ड:5» सूक्त:26» पर्यायः:0» मन्त्र:11


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

समाज की वृद्धि करने का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (सुयुजः) सुयोग्य (इन्द्रः) प्रतापी पुरुष (स्वाहा) सुन्दर वाणी से (बहुधा) अनेक प्रकार (वीर्याणि) अपने वीर कर्मों को (अस्मिन्) इस (यज्ञे) परस्पर मेल में (युनक्तु) लगावे ॥११॥
भावार्थभाषाः - विद्वान् उत्साही पुरुष समाज की उन्नति में सदा प्रयत्न करता रहे ॥११॥
टिप्पणी: ११−(इन्द्रः) प्रतापी पुरुषः (वीर्याणि) वीर-यत्। वीरकर्माणि ॥ ०५।०२६।१२ ॥