0 बार पढ़ा गया
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
गर्भाधान का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (अधि स्कन्द) उठकर खड़ा हो, (वीरयस्व) वीरता कर, और (योन्याम्) गर्भ आशय में (गर्भम्) सन्तानजनक सामर्थ्य (आ) अच्छे प्रकार (धेहि) स्थापित कर। (वृष्ण्यावन्) हे वीर्यवान् पुरुष ! तू (वृषा) ओजस्वी (असि) है, (प्रजायै) सन्तान के लिये (त्वा) तुझे (आ नयामसि) हम समीप लाते हैं ॥८॥
भावार्थभाषाः - विद्वान् पुरुष पराक्रमपूर्वक धन आदि प्राप्त करके गृहस्थाश्रम में प्रवेश करे, जिस से सन्तान की यथावत् रक्षा होवे ॥८॥
टिप्पणी: ८−(अधि) उपरि (स्कन्द) गच्छ (वीरयस्व) विक्रमयस्व (गर्भम्) सन्तानजनकं सामर्थ्यम् (आ) यथावत् (धेहि) धारय (योन्याम्) गर्भाशये (वृषा) ओजस्वी (वृष्ण्यावन्) वृषन्−यत्। वृष्णो वीरस्य कर्म तद्वन्। पराक्रमवन् (प्रजायै) सन्तानाय (त्वा) त्वाम् (आ) समीपे (नयामसि) प्रापयामः ॥
