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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
गर्भाधान का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (अग्ने) हे सर्वव्यापक परमेश्वर ! तू (ओषधीनाम्) सोम लता, अन्न, आदि ओषधियों का (गर्भः) स्तुतियोग्य आश्रय, (वनस्पतीनाम्) सेवनीय गुणों के पदार्थों का (गर्भः) ग्रहण करनेवाला और (विश्वस्य) सब (भूतस्य) पञ्च भूत का (गर्भः) आधार (असि) है, (सः) सो तू (इह) इसमें (गर्भम्) गर्भ शक्ति (आ) अच्छे प्रकार (धाः=धेयाः) धारण कर ॥७॥
भावार्थभाषाः - जैसे परमेश्वर सब उत्तम पदार्थों को अपने में धारण करता है, वैसे ही समर्थ, पराक्रमी स्त्री-पुरुष उत्तम सन्तान का कारण पराक्रम, विद्या आदि अपने में रखके गर्भाधान करें ॥७॥ यह मन्त्र कुछ भेद से यजुर्वेद में है−अ० १२। म० ३७ ॥
टिप्पणी: ७−(गर्भः) अ० ३।१०।१२। गरणीयः स्तुत्यः (असि) (ओषधीनाम्) सोमलतान्नादीनाम् (गर्भः) ग्रहीता (वनस्पतीनाम्) अ० १।३५।३। सेवनीयगुणानां (गर्भः) आधारः (विश्वस्य) सर्वस्य (भूतस्य) पृथिव्यादिभूतपञ्चकस्य (सः) स त्वम् (अग्ने) हे सर्वव्यापक परमात्मन् (गर्भम्) सन्तानजनकं सामर्थ्यम् (आ) समन्तात् (इह) अत्र (धाः) आशिषि लिङि छान्दसं रूपम्। धेयाः ॥
