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विष्णु॒र्योनिं॑ कल्पयतु॒ त्वष्टा॑ रू॒पाणि॑ पिंशतु। आ सि॑ञ्चतु प्र॒जाप॑तिर्धा॒ता गर्भं॑ दधातु ते ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

विष्णु: । योनिम् । कल्पयतु । त्वष्टा । रूपाणि । पिशतु । आ । सिञ्चतु । प्रजाऽपति: । धाता । गर्भम् । दधातु । ते ॥२५.५॥

अथर्ववेद » काण्ड:5» सूक्त:25» पर्यायः:0» मन्त्र:5


पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

गर्भाधान का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (विष्णुः) सर्वव्यापक परमेश्वर (योनिम्) गर्भाशय को (कल्पयतु) समर्थ करे, और वही (त्वष्टा) विश्वकर्मा ईश्वर [गर्भ के] (रूपाणि) आकारों को (पिंशतु) जोड़-जोड़ बनावे। (धाता) सर्वपोषक (प्रजापतिः) प्रजाओं का रक्षक परमात्मा (ते) तेरे (गर्भम्) गर्भ को (आ) सब प्रकार (सिञ्चतु) सींचे और (दधातु) पुष्ट करे ॥५॥
भावार्थभाषाः - समर्थ गर्भवती स्त्री परमेश्वर के उत्तम गुणों का स्मरण करती हुई गुणी महात्माओं का ध्यान करके गर्भ की रक्षा करे, जिससे बालक रूपवान् गुणी महात्मा उत्पन्न हो ॥५॥ यह मन्त्र ऋग्वेद में है−म० १०। सू० १८४। म० १। और स्वामी दयानन्द कृत संस्कारविधि−गर्भाधानप्रकरण में भी है ॥
टिप्पणी: ५−(विष्णुः) सर्वव्यापकः परमेश्वरः (योनिम्) गर्भाशयम् (कल्पयतु) समर्थयतु (त्वष्टा) अ० २।५।७। त्वक्षतेर्वा स्यात् करोतिकर्मणः−निरु० ८।१३। विश्वकर्मा जगदीश्वरः (रूपाणि) गर्भाकारान् (पिंशतु) अवयवयुक्तानि करोतु (आ) समन्तात् (सिञ्चतु) रसेन वर्धयतु (प्रजापतिः) सृष्टिपालकः (धाता) पोषकः (गर्भम्) गर्भस्थशिशुम् (दधातु) पुष्णातु ॥