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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
गर्भाधान का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (सिनीवालि) हे अन्नवाली पत्नी ! (गर्भम्) स्तुतियोग्य गर्भ (धेहि) धारण कर, (सरस्वति) हे उत्तम ज्ञानवाली ! (गर्भम्) गर्भ (धेहि) धारण कर। (पुष्करस्रजा) पुष्टि देनेवाले (उभा) दोनों (अश्विना) दिन और रात (ते) तेरे (गर्भम्) गर्भ के बालक को (आ) अच्छे प्रकार (धत्ताम्) पुष्ट करें ॥३॥
भावार्थभाषाः - विज्ञानवती स्त्री गर्भ धारण करके आहार-विहार आदि का ऐसा प्रबन्ध करे, जिससे गर्भस्थ बालक दिन-रात पुष्ट होता रहे ॥३॥ यह मन्त्र कुछ भेद से ऋग्वेद में है−म० १० सू० १८४। म० २। और स्वामी दयानन्द कृत संस्कारविधि−गर्भाधानप्रकरण में भी है ॥
टिप्पणी: ३−(गर्भम्) गर्भाशयगतं शुक्रम् (धेहि) धर (सिनीवालि) अ० २।२६।२। हे अन्नवति−निरु० ११।३१। (गर्भम्) (धेहि) (सरस्वति) हे विज्ञानवति (गर्भम्) गर्भशिशुम् (ते) तव (अश्विना) अहोरात्रौ−निरु० १२।१। (उभा) द्वौ (आ) समन्तात् (धत्ताम्) पोषयताम् (पुष्करस्रजा) अ० ३।२२।४। पुष्टिदातारौ ॥
