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धातः॒ श्रेष्ठे॑न रू॒पेणा॒स्या नार्या॑ गवी॒न्योः। पुमां॑सं पु॒त्रमा धे॑हि दश॒मे मा॒सि सूत॑वे ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

धात: । श्रेष्ठेन । रूपेण । अस्या: । नार्या: । गवीन्यो: । पुमांसम् । पुत्रम् । आ । धेहि । दशमे । मासि । सूतवे ॥२५.१०॥

अथर्ववेद » काण्ड:5» सूक्त:25» पर्यायः:0» मन्त्र:10


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

गर्भाधान का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (धातः) हे पोषक परमात्मा ! (श्रेष्ठेन) श्रेष्ठ (रूपेण) रूप के साथ (अस्याः) इस (नार्याः) नारी की (गवीन्योः) दोनों पार्श्वस्य नाड़ियों में (पुमांसम्) रक्षा करनेवाला (पुत्रम्) कुलशोधक सन्तान (दशमे) दसवें (मासि) महीने में (सूतवे) उत्पन्न होने को (आ) अच्छे प्रकार (धेहि) स्थापित कर ॥१०॥
भावार्थभाषाः - विदुषी पत्नी परमेश्वर के गुणों का विचार करती हुई उत्तम गुण स्वभाववाला सन्तान गर्भ के पूरे दिनों में उत्पन्न करे ॥१०॥ यही भाव मन्त्र १३ तक जानों ॥
टिप्पणी: १०−(धातः) हे सर्वधारक परमेश्वर (श्रेष्ठेन) उत्तमेन (रूपेण) आकारेण (अस्याः) (नार्याः) स्त्रियाः (गवीन्योः) अ० १।३।६। पार्श्वद्वयस्थे नाड्यौ गवीन्यौ तयोः (पुमांसम्) अ० १।८।१। पा रक्षणो−डुम्सुन्। रक्षकम् (पुत्रम्) कुलशोधकं सन्तानम् (आ) सम्यक् (धेहि) स्थापय (दशमे) (मासि) (सूतवे) अ० १।१।२। प्रसवार्थम् ॥