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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
गर्भाधान का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (रेतोधाः) वीर्य वा पराक्रम का रखनेवाला पुरुष (पर्वतात्) पर्वत से [पर्वत आदि की ओषधियों से], (दिवः) आकाश के (योनेः) गर्भ आशय से [आकाशस्थ मेघ, वायु, प्रकाश आदि से] और (अङ्गात्-अङ्गात्) अपने अङ्ग से (समाभृतम्) एकत्र किया हुआ (गर्भस्य) स्तुतियोग्य सन्तान के (शेपः) उत्पन्न करने के सामर्थ्य को (आ) यथावत् (दधत्) स्थापित करे, (पर्णम् इव) जैसे पंख को (सरौ) तीर में [लगाते हैं] ॥१॥
भावार्थभाषाः - मनुष्य ब्रह्मचर्य और औषधों के परीक्षण और सेवन से दृढाङ्ग रह कर गृहस्थाश्रम में प्रवेश करके उत्तम बलवान् संतान उत्पन्न करे ॥१॥
टिप्पणी: १−(पर्वतात्) अ० ४।९।१। शैलात्। तत्रस्थौषधिसमूहात् (दिवः) आकाशस्य (योनेः) गर्भाशयात्। आकाशस्थवायुजलप्रकाशादिप्रभावात् (अङ्गादङ्गात्) सर्वस्मात् स्वशरीराङ्गात् (समाभृतम्) संगृहीतम् (शेपः) अ० ४।३७।७। प्रजननसामर्थ्यम् (गर्भस्य) अ० ३।१०।१२। गरणीयस्य स्तुत्यस्य सन्तानस्य (रेतोधाः) रेतस्+डुधाञ् धारणपोषणयोः−असुन्। वीर्यस्य पराक्रमस्य धारकः (सरौ) शॄस्वृस्निहि०। उ० १।१०। इति सृ गतौ−उन्। शरौ। शरे (पर्णम्) पक्षम् (इव) यथा (आ) समन्तात् (दधत्) लेटि रूपम्। धरेत् ॥
