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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
छोटे-छोटे दोषों के नाश का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (त्रिशीर्षाणम्) तीन, ऊँचे-नीचे और मध्य स्थानों में आश्रयवाले, (त्रिककुदम्) तीन [कायिक, वाचिक, मानसिक] सुखों की भूमि काटनेवाले, (सारङ्गम्) रेंगनेवाले [वा चितकबरे] और (अर्जुनम्) संचय करनेवाले [वा श्वेतवर्ण] (क्रिमिम्) कीड़ों को (शृणामि) मैं मारता हूँ, (अस्य) इसकी (पृष्टीः) पसलियों को (अपि) भी, और (तत्) जो (शिरः) शिर है [उसको भी] (वृश्चामि) तोड़े डालता हूँ ॥९॥
भावार्थभाषाः - जिस प्रकार रोगजनक जन्तुओं को शुद्धि आदि द्वारा नाश करने से शारीरिक स्वास्थ्य बढ़ता है, इसी प्रकार आत्मिक दोषों को हटाने से आत्मिक शान्ति होती है ॥९॥ इस मन्त्र का मिलान अथर्व० २।३२।२। से करो ॥
टिप्पणी: ९−(त्रिशीर्षाणम्) श्रयतेः स्वाङ्गे शिरः किच्च। उ० ४।१९४। इति श्रिञ् सेवायाम्−असुन्। शीर्षंश्छन्दसि। पा० ६।१।६०। इति शिरः शब्दस्य शीर्षन्। त्रिषु ऊर्ध्वाधोमध्यस्थानेषु शिर आश्रयो यस्य तम् (त्रिककुदम्) त्रि+क+कु+दम्। आतोऽनुपसर्गे कः। पा० ३।२।३। इति त्रिककु+दाप् छेदने क। त्रयाणां कानां कायिकवाचिकमानसिकसुखानां कुं भूमिं दाति छिनत्ति यस्तम्। अन्यद् यथा−अ० २।३२।२। (क्रिमिम्) कीटम् (सारङ्गम्) सृ गतौ−अङ्गच्, वृद्धिश्च। सरणशीलम्। शबलवर्णम् (अर्जुनम्) संचयशीलम्। श्वेतवर्णम्। (शृणामि) हन्मि (पृष्टीः) पार्श्वस्थानि (अपि) (वृश्चामि) छिनद्मि (यत्) (शिरः) मस्तकम् ॥
