0 बार पढ़ा गया
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
छोटे-छोटे दोषों के नाश का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (यः) जो [कीड़ा] (अक्ष्यौ) दोनों आँखों में (परिसर्पति) रेंग जाता है, (यः) जो (नासे) दोनों नथनों में (परिसर्पति) रेंग जाता है, और (यः) जो (दताम्) दाँतों के (मध्यम्) बीच में (गच्छति) चलता है, (तम्) उस (क्रिमिम्) कीड़े को (जम्भयामसि) हम नाश करते हैं ॥३॥
भावार्थभाषाः - विज्ञानी पुरुष आत्मविघ्नों का इस प्रकार नाश करे, जैसे वैद्य कृमि रोग को ॥३॥
टिप्पणी: ३−(यः) क्रिमिः (अक्ष्यौ) अ० १।२७।१। अक्षिणी। नेत्रे (परिसर्पति) परितो गच्छति (यः) (नासे) द्वे नासिकाछिद्रे (दताम्) पद्दन्नोमास्०। पा० ६।१।६३। इति दन्तस्य दत्। दन्तानाम् (यः) (मध्यम्) अन्तर्वर्त्ति देशम् (गच्छति) प्राप्नोति (तम्) (क्रिमिम्) कीटम् (जम्भयामसि) नाशयामः ॥
