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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
छोटे-छोटे दोषों के नाश का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (धनपते) हे धन के स्वामी (इन्द्र) बड़े ऐश्वर्यवाले वैद्य ! (अस्य) इस (कुमारस्य) कमनीय बालक के (क्रिमीन्) कीड़ों को (जहि) मिटा दे। (मम) मेरे (उग्रेण) प्रचण्ड (वचसा) [वैदिक] वचन से (विश्वाः) सब (अरातयः) वैरी (हताः) मारे गये ॥२॥
भावार्थभाषाः - जैसै वैद्य बालक के उदर के कृमिरोग को नाश करता है, वैसे ही मनुष्य ज्ञान के अभ्यास से अज्ञान आदि दोष हटावे ॥२॥
टिप्पणी: २−(अस्य) निर्दिष्टस्य (इन्द्र) हे परमैश्वर्यवन् वैद्य (कुमारस्य) अ० ३।१२।३। कमनीयस्य बालकस्य (क्रिमीन्) कीटान् (धनपते) हे धनस्य स्वामिन् (जहि) नाशय (हताः) नाशिताः (विश्वाः) सर्वे (अरातयः) शत्रवः (उग्रेण) प्रचण्डेन (वचसा) विज्ञानवचनेन (मम) मदीयेन ॥
