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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
छोटे-छोटे दोषों के नाश का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (अस्य) इस [क्रिमी] के (वेशासः) मुख्य सेवक (हतासः=हताः) नष्ट हों, और (परिवेशसः) साथी भी (हतासः) नष्ट हों। (अथो=अथ−उ) और भी (ये) जो (क्षुल्लकाः इव) बहुत सूक्ष्म आकारवाले से हैं, (ते) वे (सर्वे) सब (क्रिमयः) कीड़े (हताः) नष्ट हों ॥१२॥
भावार्थभाषाः - मनुष्य अपनी स्थूल और सूक्ष्म कुवासनाओं का और उन की सामग्री का सर्वनाश कर दे, जैसे रोगजनक जन्तुओं को औषध आदि से नष्ट करते हैं ॥१२॥
टिप्पणी: १२−यथा−अ० २।३२।५। (हतासः) हताः (वेशसः) प्रवेशकाः। मुख्यसेवकाः (परिवेशसः) परितः स्थिताः। अनुचरा (अथो) अपि च (क्षुल्लकाः) क्षुदिर् सम्पेषणे−क्विप्+लक प्राप्तौ−अच्। सूक्ष्माकाराः क्षुद्रजन्तवः ॥
