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ह॒तो राजा॒ क्रिमी॑णामु॒तैषां॑ स्थ॒पति॑र्ह॒तः। ह॒तो ह॒तमा॑ता॒ क्रिमि॑र्ह॒तभ्रा॑ता ह॒तस्व॑सा ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

हत: । राजा । क्रिमीणाम् । उत । एषाम् । स्थपति:। हत: । हत: । हतमाता । क्रिमि: । हतऽभ्राता । हतऽस्वसा ॥२३.११॥

अथर्ववेद » काण्ड:5» सूक्त:23» पर्यायः:0» मन्त्र:11


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

छोटे-छोटे दोषों के नाश का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (एषाम्) इन (क्रिमीणाम्) कीड़ों का (राजा) राजा (हतः) नष्ट होवे, (उत) और (स्थपतिः) द्वारपाल (हतः) नष्ट होवे। (हतमाता) जिसकी माता नष्ट हो चुकी है, (हतभ्राता) जिसका भ्राता नष्ट हो चुका है, और (हतस्वसा) जिसकी बहिन नष्ट हो चुकी है, (क्रिमिः) वह चढ़ाई करनेवाला कीड़ा (हतः) मार डाला जावे ॥११॥
भावार्थभाषाः - मनुष्य अपने दोषों और उनके कारणों को उचित प्रकार से समझ कर नष्ट करे, जैसे वैद्य रोगों के प्रधान और गौण कारणों को जानकर उन्हें निवृत्त करता है ॥११॥
टिप्पणी: ११−तथा−अ० २।३२।४। (हतः) नाशितो भवतु (राजा) अधिपतिः (क्रिमीणाम्) कीटानाम् (उत) अपि च (एषाम्) उपस्थितानाम् (स्थपतिः) द्वारपालः (हतः) (हतमाता) नष्टमातृकः (क्रिमिः) (हतभ्राता) नष्टमातृकः (हतस्वसा) नष्टभगिनीकः ॥