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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
रोग नाश करने का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (अन्यक्षेत्रे) दूर देश में (न) इस समय (वशी) वश में करनेवाला (सन्) होकर (रमसे=रमस्व) तू ठहर, और (नः) हमें (मृडयासि) सुख दे। (तक्मा) ज्वर (प्रार्थः) चालू (उ) अवश्य (अभूत्) हो गया है, (सः) वह (बल्हिकान्) हिंसावाले देशों को (गमिष्यति) चला जाएगा ॥९॥
भावार्थभाषाः - सदाचारी पुरुष प्रयत्न करके नीरोग, और हिंसाप्राय लोग रोगग्रसित रहते हैं ॥९॥
टिप्पणी: ९−(अन्यक्षेत्रे) दूरदेशे (न) सम्प्रति−निरु० ७।३१। (रमसे) लोडर्थे−लट्। रमस्व। विरम (वशी) अ० १।२१।१। वशयिता (मृडयासि) लेटि रूपम्। सुखयेः (नः) अस्मान् (अभूत्) (उ) अवश्यम् (प्रार्थः) उषिकुषिगार्तिभ्यस्थन्। उ० २।४। इति ऋ गतौ−थन्। प्रकर्षेण गतिशीलः (तक्मा) ज्वरः (सः) (गमिष्यति) प्राप्स्यति (बल्हिकान्) म० ५। हिंसादेशान् ॥
