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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
रोग नाश करने का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (परेत्य) दूर जाकर (महावृषान्) बड़ी वृष्टिवाले देशों और (मूजवतः) मूजवाले पहाड़ों, (बन्धु=बन्धून्) अपने बन्धुओं को (अद्धि) खाले। (एतानि) इन और (इमा=इमानि) इन (अन्यक्षेत्राणि) अन्य निवासस्थानों को (तक्मने) ज्वर के लिये (वै) अवश्य (प्रब्रूमः) हम बताये देते हैं ॥८॥
भावार्थभाषाः - अधिक वृष्टिवाले, अधिक तृणवाले, और इसी प्रकार अधिक तापवाले देशों में प्राणी ज्वर से पीड़ित रहते हैं। इससे मनुष्य उचित प्रबन्ध रक्खें ॥८॥
टिप्पणी: ८−(महावृषान्) म० ५। अतिवृष्टियुक्तान् देशान् (मूजवतः) म० ६। (बन्धु) विभक्तिलोपः। स्वबन्धून् (परेत्य) दूरे गत्वा (प्र) प्रकर्षेण (एतानि) समीपस्थानि (तक्मने) ज्वराय (ब्रूमः) कथयामः (अन्यक्षेत्राणि) क्षि निवासे−ष्ट्रन्। अन्यनिवासस्थानानि (वै) निश्चयेन (इमा) इमानि पार्श्वस्थानि ॥
