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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
रोग नाश करने का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (तक्मन्) हे ज्वर ! (व्याल) हे सर्प ! हे धूर्त ! (व्यङ्ग) हे कुरूप ! (विगद) तू बोल, (भूरि) बहुत दूर (यवय) चला जा (निष्टक्करीम्) ठटोल, निर्लज्ज (दासीम्) दासी [नीच स्त्री] को (इच्छ) ढूँढ़ और (ताम्) उसको (वज्रेण) अपने वज्र से (समर्पय) मार गिरा ॥६॥
भावार्थभाषाः - कुचाली, व्यभिचारी स्त्री पुरुष रोगी होकर दारुण दुःख भोगते हैं, इससे मनुष्य सदाचारी होकर सदा स्वस्थ रहें ॥६॥
टिप्पणी: ६−(तक्मन्) हे ज्वर (व्याल) वि+अड व्याप्तौ उद्यमे च−घञ्, डस्य लः। हे सर्प। हे धूर्त (वि) विशेषेण (गद) वद (व्यङ्ग) वि विकलमङ्गं यस्य। हे कुरूप (भूरि) बहुदूरम् (यवय) पृथग्भव (दासीम्) नीचस्त्रियम् (निष्टक्करीम्) श्रः करन्। उ० ४।३। इति निः+तक हसने−करन्, ङीप्। उपहासशीलाम्। निर्लज्जाम् (इच्छ) अन्विच्छ (ताम्) दासीम् (वज्रेण) स्वकुठारेण (समर्पय) सम्+ऋ गतौ हिंसायां च−णिच्, युक्। निक्षिप ॥
