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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
रोग नाश करने का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (तक्मन्) हे ज्वर ! (भ्रात्रा) अपने भ्राता (बलासेन) बल गिरानेवाले सन्निपात, कफ आदि, और (स्वस्रा) अपनी बहिन (कासिकया सह) कुत्सित खाँसी के साथ, (भ्रातृव्येण) अपने भतीजे (पाप्मा=पाप्मना) चर्म रोग के (सह) साथ (अमुम्) उस (अरणम्) न भाषण करने योग्य निन्दित (जनम्) जन के पास (गच्छ) चला जा ॥१२॥
भावार्थभाषाः - कुकर्मी अपथ्यभोगी पुरुष ज्वर, खाँसी आदि से पीड़ित रहते हैं। इस से मनुष्य सुकर्मी और पथ्यभोगी होवें ॥१२॥
टिप्पणी: १२−(तक्मन्) हे ज्वर ! (भ्रात्रा) सहोदरेण (बलासेन) म० ११। बलनाशकेन श्लेष्मविकारेण (स्वस्रा) अ० १।२८।४। भगिन्या (कासिकया) कास−कुत्सायां कन्, टाप्। कुत्सितकासेन (सह) सहितः (पाप्मा) रक्षितव्यमस्मात्। नामन्सीमन्व्योमन्०। उ० ४।१५१। इति पा रक्षणे−मनिन्, पुक् च। विभक्तेः सु। पाप्मना। चर्मरोगेण (भ्रातृव्येण) भ्रातुर्व्यच्च। पा० ४।१।१४४। इति भ्रातृ−व्यत्। भ्रातृजेन (सह) (गच्छ) प्राप्नुहि (अमुम्) तम् (अरणम्) अ० १।१९।३। अ+रण शब्दे−अप्। असम्भाष्यम्। निन्द्यम्। (जनम्) लोकम् ॥
