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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
शत्रुओं को जीतने को उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (ये) जो विद्वान् लोग (संग्रामस्य) संग्राम के (ईशते) स्वामी होते हैं, उन (सर्वे) सब (देवाः) महात्मा लोगों ने (हरिणस्य) हरिण के (अजिनेन) चर्म से युक्त (दुन्दुभिना) दुन्दुभि से (च) निश्चय करके (परा=पराजित्य) हराकर (अतित्रसन्) डरा दिया है ॥७॥
भावार्थभाषाः - शूर सेनापति लोग शत्रुओं को जीत कर भगा देवें ॥७॥
टिप्पणी: ७−(परा) पराजित्य (अमित्रान्) म० १। शत्रून् (दुन्दुभिना) बृहड्ढक्कया (हरिणस्य) मृगस्य (अजिनेन) अजिन−अर्शआद्यच्। चर्मयुक्तेन (च) निश्चयेन (सर्वे) सकलाः (देवाः) महात्मानः (अतित्रसन्) त्रसी उद्वेगे णिचि लुङ्। त्रासितवन्तः (ये) देवाः (संग्रामस्य) युद्धस्य (ईशते) ईश्वरा भवन्ति ॥
