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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
शत्रुओं को जीतने को उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - [हे दुन्दुभि !] (वानस्पत्यः) सेवनियों के पालक [सेनापति] से प्राप्त हुआ, (उस्रियाभिः) वस्तियों की रक्षक सेनाओं से (संभृतः) यथावत् रक्खा गया, (विश्वगोत्र्यः) समस्त कुलों का हितकारक तू (अमित्रेभ्यः) वैरियों को (प्रत्रासम्) अति भय (वद) कह दे, [जैसे] (आज्येन) घी से (अभिघारितः) सींचा हुआ [अग्नि प्रकाशित होता है] ॥३॥
भावार्थभाषाः - सेनापति लोग घृत से प्रज्वलित अग्नि के समान प्रचण्ड होकर शत्रुओं को भयभीत करदें ॥३॥
टिप्पणी: ३−(वानस्पत्यः) सू० २० म० १। वनस्पतिभ्यः सेव्यानां पालकेभ्यः सेनापतिभ्य आगतः (संभृतः) सम्यग्धृतः (उस्रियाभिः) सू० २० म० १। वसतिरक्षिकाभिः सेनाभिः (विश्वगोत्र्यः) तस्मै हितम्। पा० ५।१।५। इति–विश्वगोत्र−यत्। सर्वकुलेभ्यो हितः (प्रत्रासम्) अतिभयम् (अमित्रेभ्यः) म० १। शत्रुभ्यः (वद) कथय (आज्येन) घृतेन (अभिघारितः) अभिषिक्तोऽग्निरिव ॥
