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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
शत्रुओं को जीतने को उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (आज्ये हुते) घृत भाग में चढ़ाने पर (मनसा) मन से (चक्षुषा) नेत्र से (च) और (हृदयेन) हृदय से (उद्वेपमानाः) थरथराते हुए, (बिभ्यतः) भय मानते हुए (अमित्राः) वैरी लोग (प्रत्रासेन) घबराहट के साथ (धावन्तु) भागें ॥२॥
भावार्थभाषाः - जैसे अग्नि घी चढ़ाने से प्रचण्ड होता है, वैसे ही युद्धाग्नि प्रचण्ड होने पर कुशल सेनापति शत्रुओं को अङ्ग भङ्ग करके भगा दे ॥२॥
टिप्पणी: २−(उद्वेपमानाः) अत्यन्तं कम्पमानाः (मनसा) चित्तेन (चक्षुषा) नेत्रेण (हृदयेन) अन्तःकरणेन (धावन्तु) पलायन्ताम् (बिभ्यतः) भयं प्राप्नुवन्तः (अमित्राः) पीडकाः शत्रवः (प्रत्रासेन) व्याकुलत्वेन (आज्ये) घृते (हुते) अग्नौ प्रक्षिप्ते सति (च) ॥
