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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
नास्तिक के तिरस्कार का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (सा) वह (ब्रह्मगवी) ब्रह्मवाणी (पच्यमाना) पचायी [तपायी] जाती हुई (यावत्) जब तक (अभि) चारों ओर (विजङ्गहे=विजङ्गन्ति) फड़-फड़ाती रहती है। वह (राष्ट्रस्य) राज्य का (तेजः) तेज (निर्हन्ति) मिटा देती है, और (न वीरः) न कोई वीर पुरुष (वृषा) ऐश्वर्यवान् (जायते) उत्पन्न होता है ॥४॥
भावार्थभाषाः - जहाँ वेदविद्या का निरादर होता है, वह राज्य सब नष्ट हो जाता है और सब लोग निर्बल हो जाते हैं ॥४॥
टिप्पणी: ४−(ब्रह्मगवी) गोरतद्धितलुकि। पा० ५।४।९२। इति ब्रह्मगो−टच्, ङीप्। ब्रह्मविद्या (पच्यमाना) तप्यमाना (यावत्) यत्परिमाणम् (सा) प्रसिद्धा (अभि) सर्वतः (विजङ्गहे) गमेर्यङ्लुकि लोटि मध्यमपुरुषे जङ्गहि, इत्यस्य स्थाने जङ्गहे इति रूपं लटः प्रथमपुरुषस्य स्थाने। विजङ्गन्ति विशेषेण भृशं गच्छति (तेजः) प्रभावः (राष्ट्रस्य) राज्यस्य (निर्हन्ति) नितरां नाशयति (न) निषेधे (वीरः) शूरः (जायते) प्रादुर्भवति (वृषा) ऐश्वर्यवान्। इन्द्रः ॥
