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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
नास्तिक के तिरस्कार का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (येन) जिस [जल] से (मृतम्) मृतक को (स्नपयन्ति) स्नान कराते हैं और (येन) जिससे (श्मश्रूणि) अपने शरीर में आश्रित केश वा अङ्गों को (उन्दते) सींचते हैं। (ब्रह्मज्य) हे ब्राह्मण को हानि पहुँचानेवाले ! (देवाः) महात्माओं ने (ते) तेरे लिये (अपाम्) जलका (तम् वै) वही (भागम्) भाग (अधारयन्) ठहराया है ॥१४॥
भावार्थभाषाः - ईश्वर की आज्ञा न पालनेवाले पुरुष अन्त में हारकर अपने मृतक बान्धवों के शोक में पड़े रहते हैं ॥१४॥
टिप्पणी: १४−(येन) जलेन (मृतम्) मृतकम् (स्नपयन्ति) स्नानं कारयन्ति (श्मश्रूणि) शीङ् शयने−मनिन् स च डित्। इति श्म शरीरम्। श्मनि श्रयतेर्डुन्। उ० ५।२८। इति श्म+श्रिञ् सेवायां−डुन् रुट् च। श्म शरीरम्...श्मश्रु लोम श्मनि श्रितं भवति−निरु० ३।५। शरीरे श्रितानि लोमानि इन्द्रियाणि वा (येन) (उन्दते) क्लेदयन्ति। अन्यत् पूर्ववत्−म० १३ ॥
