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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
नास्तिक के तिरस्कार का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (याम्) जिस (पदयोपनीम्) पद व्याकुल करनेवाली (कूद्यम्=कूदीम्) दुःखित शब्द देनेवाली बेड़ी को (मृताय) मरने के लिये (अनुबन्धन्ति) जकड़ देते हैं। (ब्रह्मज्य) हे ब्राह्मण के हानिकारक ! (देवाः) महात्माओं ने (तत्) उसको (वै) अवश्य (ते) तेरे लिये (उपस्तरणम्) विस्तर (अब्रुवन्) कहा है ॥१२॥
भावार्थभाषाः - दुराचारी नास्तिकों को कारागार आदि में रख कर कठिन दण्ड देवें ॥१२॥
टिप्पणी: १२−(याम्) (मृताय) मरणाय (अनुबध्नन्ति) अनुकृष्य धारयन्ति (कूद्यम्) कूङ् आर्तस्वरे−क्विप्। कुवम् आर्तस्वरं ददाति दा क, ङीप्। छान्दसो यण्। कूदीम्। आर्तस्वरदात्रीं शृङ्खलाम् (पदयोपनीम्) युप विमोहने−ल्युट्, ङीप्। पदयोर्व्याकुलयित्रीम् (तत्) (वै) अवश्यम् (ब्रह्मज्य) म० ७। हे ब्राह्मणस्य हानिकारक (ते) तुभ्यम् (देवाः) महात्मानः (उपस्तरणम्) स्तॄञ् आच्छादने ल्युट्। विष्टरम् (अब्रुवन्) अकथयन् ॥
