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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
नास्तिक के तिरस्कार का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (ताः) वे लोग (नव नवतयः) नव बार नब्बे [९*९० वा ८१०] (अपि) भी [थे] (याः) जिन को (भूमिः) भूमि ने (व्यधूनुन) हिला दिया है, और जो (ब्राह्मणीम्) ब्राह्मणसंबन्धिनी (प्रजाम्) प्रजा को (हिंसित्वा) सताकर (असंभव्यम्) संभावना [शक्यता] के बिना (पराभवन्) हार गये हैं ॥११॥
भावार्थभाषाः - असंख्यात होने पर भी नास्तिक पराजित होते हैं [अ० ५। १८।१२। का मिलान करो] ॥११॥
टिप्पणी: ११−(नव नवतयः) नवगुणिता नवतयः। ९*९०=८१०। असङ्ख्याते इत्यर्थः (एव) अपि (ताः) जनताः। अन्यद् यथा−अ० ५।१८।१२ ॥
