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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
नास्तिक के तिरस्कार का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (राजा) राजा (वरुणः) श्रेष्ठ परमात्मा ने (अब्रवीत्) कहा है(एतत्) यह (देवकृतम्) इन्द्रियों से किया हुआ (विषम्) विष [समान पाप] है, (कश्चन) कोई भी (ब्राह्मणस्य) ब्राह्मण की (गाम्) विद्या को (जग्ध्वा) हड़पकर (राष्ट्रे) राज्य में (न) नहीं (जागार) जागता रहा है ॥१०॥
भावार्थभाषाः - परमेश्वर ने उपदेश किया है कि जैसे विष खाने से मनुष्य अचेत हो जाता है, वैसे ही वेदविद्या के नाश से सब लोग आलसी और निरुत्साही हो जाते हैं ॥१०॥
टिप्पणी: १०−(विषम्) विषं यथा (एतत्) दुष्कर्म (देवकृतम्) इन्द्रियविकारकृतम् (राजा) वरुणः श्रेष्ठः परमेश्वरः (अब्रवीत्) वेदे कथितवान् (न) निषेधे (ब्राह्मणस्य) ब्रह्मवेत्तुः (गाम्) विद्याम् (जग्ध्वा) भुक्त्वा नाशयित्वा (राष्ट्रे) राज्ये (जागार) जागृ निद्राक्षये−लिटि छान्दसं रूपम्। जजागार विनिद्रो जागरूकः सावधानो बभूव (कश्चन) कश्चिदपि ॥
