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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
वेदविद्या की रक्षा का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (प्रियतनोः=०−नुः) तन को प्रिय लगनेवाले (अग्निः इव) अग्नि के समान वर्तमान (ब्राह्मणः) ब्रह्मज्ञानी (न) नहीं (हिंसितव्यः) सताया जा सकता है। (हि) क्योंकि (सोमः) चन्द्रमा (अस्य) इसका (दायादः) दायभागी [के समान] और (इन्द्रः) सूर्य (अस्य) इसका (अभिशस्तिपाः) अपवाद से बचानेवाला है ॥६॥
भावार्थभाषाः - ब्राह्मण वेदों का तत्त्व जानने से महाप्रबल होता है, क्योंकि वह सूर्य चन्द्रमा के समान नियम पर चलता है ॥६॥
टिप्पणी: ६−(न) निषेधे (ब्राह्मणः) वेदज्ञ आप्तपुरुषः (हिंसितव्यः) केनापि हिंसितुमशक्यः (अग्निः) पावकः (प्रियतनोः) सुपां सुपो भवन्ति। वा० पा० ७।१।३९। इति प्रथमायाः षष्ठी। प्रियतनुः। शरीरस्य हितकरः (इव) यथा (सोमः) चन्द्रः (हि) यस्मात्कारणात् (अस्य) ब्राह्मणस्य (दायादः) दा दाने−घञ्। आतो युक् चिण्कृतोः। पा० ७।३।३३। इति युक्। दायं विभजनीयधनमादत्ते। आतश्चोपसर्गे पा० ३।१।१३६। इति आ+दा−क। यद्वा, दायमत्ति, अद भोजने−अण्। दायभागी पुरुषो यथा (इन्द्रः) सूर्यः (अस्य) (अभिशस्तिपाः) अ० २।१३।३। अपवादाद् रक्षकः ॥
