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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
वेदविद्या की रक्षा का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (चर्मणा) काँचुली से (आविष्टिता) वियोग रखनेवाली, (अघविषा) घोर विषैली (पृदाकूः इव) फुँसकारती साँपिनी के समान (सा एषा) वह यह (ब्राह्मणस्य) ब्राह्मण की (गौः) वाणी, (राजन्य) हे राजन् ! (तृष्टा) प्यास से व्याकुल के समान है (अनाद्या) जिसे कोई नष्ट नहीं कर सकता ॥३॥
भावार्थभाषाः - जैसे काँचुली से निकल कर साँपिनी दुष्ट विषैली होती है, वैसे ही अविद्या के फैलने से नष्ट वेदविद्या सब ओर विपत्ति फैलाती है ॥३॥
टिप्पणी: ३−(आविष्टिता) आङ्+विष विप्रयोगे−क्त। तदस्य संजातं तारकादिभ्य इतच्। पा० ५।२।३६। इति आविष्ट−इतच्। आविष्टेन वियोगेन युक्ता (अघविषा) घोरविषवती (पृदाकूः) अ० १।२७।१। कुत्सितशब्दकारिणी सर्पिणी (इव) यथा (चर्मणा) त्वगावरणेन (सा) (ब्राह्मणस्य) विप्रस्य (राजन्य) हे राजन् (तृष्टा) ञितृषा पिपासायाम्−क्त। पिपासितेव व्याकुला (गौः) वाणी (अनाद्या) म० १। केनापि न नाशनीया ॥
