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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
वेदविद्या की रक्षा का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (अक्षद्रुग्धः) इन्द्रियों से नष्ट किया हुआ, (पापः) पापी, (आत्मपराजितः) आत्मा से हारा हुआ (सः) वह (राजन्यः) क्षत्रिय (ब्राह्मणस्य) ब्राह्मण, वेदवेत्ता की (गाम्) वाणी को (अद्यात्) नाश करे, (अद्य) आज (जीवानि=जीवतु) वह जीवे, (श्वः) कल (मा) नहीं ॥२॥
भावार्थभाषाः - वेदविद्या पर न चलने से दुष्कर्मों के कारण अजितेन्द्रिय राजा का जीवन घट जाता है ॥२॥
टिप्पणी: २−(अक्षद्रुग्धः) अक्षैरिन्द्रियैर्नाशितः। अजितेन्द्रियः (राजन्यः) राजा (पापः) पाप−अर्शआद्यच्। दुष्टः (आत्मपराजितः) आत्मना पराभूतः (सः) (ब्राह्मणस्य) वेदवेत्तुः विप्रस्य (गाम्) वाणीम् (अद्यात्) भक्षयेत् (अद्य) अस्मिन् दिने (मा) निषेधे (श्वः) आगामिनि दिवसे ॥
