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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
वेदविद्या की रक्षा का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (अग्निः) अग्नि [सूर्य] (वै) ही (नः) हमारा (पदवायः) पथदर्शक, और (सोमः) चन्द्रमा (दायादः) दायभागी (उच्यते) कहा जाता है। (इन्द्रः) परमेश्वर (अभिशस्ता=०−स्तुः) अपवादी का (हन्ता) नाश करनेवाला है। (तथा) वैसा ही (तत्) उस बात को (वेधसः) विद्वान् लोग (विदुः) जानते हैं ॥१४॥
भावार्थभाषाः - जो मनुष्य सूर्य चन्द्रमा के समान सन्मार्ग में चलते हैं, वे परमात्मा की कृपा से दुष्कर्मों से बचकर आनन्द भोगते हैं ॥१४॥
टिप्पणी: १४−(अग्निः) सूर्यः (वै) निश्चयेन (नः) अस्माकम् (पदवायः) पद+वा गतौ−घञ्, युक् च। पथदर्शकः (सोमः) चन्द्रः (दायादः) म० ६। दायभागी। बन्धुः (उच्यते) कथ्यते (हन्ता) नाशकः (अभिशस्ता) शसु हिंसायाम्−तृच्। सुपां सुलुक्०। पा० ७।१।३९। इति षष्ठ्याः सुः। अभिशस्तुः। मिथ्यापवादकस्य (इन्द्रः) परमेश्वरः (तथा) तेन प्रकारेण (तत्) वचनम् (वेधसः) अ० १।११।१। मेधाविनः (विदुः) जानन्ति ॥
