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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
वेदविद्या की रक्षा का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (ताः) वे (जनताः) लोग (एकशतम्) एक सौ एक [थे] (याः) जिन को (भूमिः) भूमि ने (व्यधूनुत) हिला दिया है और जो (ब्राह्मणीम्) ब्राह्मणसंबन्धिनी (प्रजाम्) प्रजा को (हिंसित्वा) सता कर (असंभव्यम्) संभावना [शक्यता] के विना (पराभवन्) हार गये हैं ॥१२॥
भावार्थभाषाः - बहुत से मनुष्य इस पृथिवी पर वेदज्ञानियों को सताने से निःसन्देह नष्ट हो गये हैं ॥१२॥
टिप्पणी: १२−(एकशतम्) एकाधिकं शतम् असंख्याताः (ताः) (जनताः) समूहार्थे−तल्। जनसमूहाः (याः) (भूमिः) पृथिवी (व्यधूनुत) धूञ् कम्पने−लङ्। विशेषेणाकम्पयत (प्रजाम्) जनताम् (हिंसित्वा) दुःखयित्वा (ब्राह्मणीम्) ब्रह्मन्−अण्, ङीप्। ब्राह्मणसम्बन्धिनीम् (असंभव्यम्) अ+सम्+भू−यत्। यथा तथा सम्भावनां शक्यतां विना। अवश्यम् (पराभवन्) पराजयं गताः ॥
