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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
ब्रह्म विद्या का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (उत्) और (यत्) जो (स्त्रियाः) शब्दकारिणी विद्या के (दश) दस (पतयः) रक्षक (पूर्वे) सब (अब्राह्मणाः) ब्राह्मण से भिन्न होवें (च) और [जो] (ब्रह्मा) ब्रह्मा, ब्रह्मज्ञानी ने (इत्) ही (हस्तम्) हाथ (अग्रहीत्) पकड़ा, (सः एव) वही (एकधा) मुख्य प्रकार से (पतिः) रक्षक है ॥८॥
भावार्थभाषाः - अविद्वान् लोग दस वा अधिक मिलकर वेदविद्या की रक्षा नहीं कर सकते, ब्रह्मज्ञानी अकेला ही उसकी रक्षा कर सकता है ॥८॥
टिप्पणी: ८−(उत्) अपि च (यत्) (पतयः) रक्षकाः (दश) दशसंख्याकाः (स्त्रियाः) स्त्यायतेर्ड्रट्। उ० ४।१६६। इति ष्ट्यै स्त्यै शब्दसंघातयोः−ड्रट्, ङीप् यलोपः। स्त्यायति शब्दयति सा स्त्री तस्याः विद्यायाः (पूर्वे) समस्ताः (अब्राह्मणाः) ब्राह्मणेन वेदज्ञेन भिन्नाः (ब्रह्मा) वृद्धिशीलो ब्रह्मवेत्ता (च) (इत्) एव (हस्तम्) वशम् (अग्रहीत्) आनीतवान् (सः) ब्रह्मा (एव) अवधारणे (पतिः) रक्षकः (एकधा) मुख्य प्रकारेण ॥
