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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
ब्रह्म विद्या का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (न) न तो (अस्य) उसकी (धेनुः) दुधैल गौ (कल्याणी) कल्याणी [होती है] और (न) (अनड्वान्) छकड़ा ले चलनेवाला बैल (धुरम्) धुर वा जूये को (सहते) सहता है। (यत्र) यहाँ (विजानिः) विद्याभ्यास बिना (ब्राह्मणः) ब्राह्मण (रात्रिम्) रात को (पापया) कष्ट से (वसति) वसता है ॥१८॥
भावार्थभाषाः - जिस राज्य में ब्राह्मण विद्याभ्यास नहीं करता, वहाँ दुधैल गौयें और बलवान् बैल आदि उपकारी पशु नहीं होते हैं ॥१८॥
टिप्पणी: १८−(न) निषेधे (अस्य) राज्ञः (धेनुः) दुग्धवती गौः (कल्याणी) मङ्गलवती (न) निषेधे (अनड्वान्) अ० ४।११।१। शकटवाही वृषभः (सहते) वहति (धुरम्) युगम्। भारम् (विजानिः) जाया−म० २। जायाया निङ्। पा० ५।४।१३४। वि+जायाशब्दस्य निङ्। विगता जाया विद्या यस्य सः। विगतविद्याभ्यासः (यत्र) यस्मिन् राष्ट्रे (ब्राह्मणः) वेदवेत्ता (रात्रिम्) निशाम् (वसति) वासं करोति (पापया) सुपां सुलुक्०। पा० ७।१।३९। इति विभक्तेर्या। पापेन कष्टेन ॥
