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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
ब्रह्म विद्या का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (अस्य) उसकी (जाया) विद्या (शतवाही) सैकड़ों कार्य निबाहनेवाली (कल्याणी) कल्याणी होकर (तल्पम्) प्रतिष्ठा (न) नहीं (आ शये=शेते) पाती है। (यस्मिन्) जिस (राष्ट्रे) राज्य में (ब्रह्मजाया) वेदविद्या (अचित्या) अचेतपन से (निरुध्यते) रोकी जाती है ॥१२॥
भावार्थभाषाः - अविद्या के प्रचार और वेदविद्या की रोक से किसी राज्य में कल्याण नहीं होता ॥१२॥
टिप्पणी: १२−(न) निषेधे (अस्य) राष्ट्रस्य (जाया) म० ६। विद्या (शतवाही) शत+वह प्रापणे−अण्, ङीप्। बहुपदार्थप्रापयित्री (कल्याणी) कल्ये प्रातः अण्यते शब्द्यते। कल्य+अण शब्दे जीवने च−घञ्, ङीप्। मङ्गलप्रदा (तल्पम्) खष्पशिल्प०। उ० ३।२८। इति तल प्रतिष्ठायाम्−प। प्रतिष्ठाम् स्थिरताम् (आ शये) तलोपः। आशेते। प्राप्नोति (यस्मिन्) (राष्ट्रे) राज्ये (निरुध्यते) निवार्यते (ब्रह्मजाया) म० २। ब्रह्मविद्या (अचित्या) चिती क्तिन्। अचेतनया। अज्ञानेन ॥
