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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
ब्रह्म विद्या का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - [मनुष्य] (ब्रह्मजायाम्) वेदविद्या को (पुनर्दाय) अवश्य देकर और (देवैः) उत्तम गुणों के कारण (निकिल्विषम्) पाप से छुटकारा (कृत्वा) करके [पृथिव्याः] पृथिवी के (ऊर्जम्) बलदायक अन्न को (भक्त्वा) बाँट कर (उरुगायम्) बड़ी कीर्तिवाले परमात्मा को (उपासते) भजते हैं ॥११॥
भावार्थभाषाः - मनुष्य वेदविद्या द्वारा शुद्धचित्त होकर सब पदार्थों से उपकार करके परमात्मा की आज्ञा पालते रहते हैं ॥११॥
टिप्पणी: ११−(पुनर्दाय) अवश्यं दत्वा (ब्रह्मजायाम्) म० २। वेदविद्याम् (कृत्वा) विधाय (देवैः) दिव्यगुणैः (निकिल्विषम्) म० २। पापराहित्यम् (ऊर्जम्) बलकरमन्नम् (पृथिव्याः) भूमेः (भक्त्वा) भज भागे सेवायां च। विभज्य (उरुगायम्) अ० २।१२।१। उरु+गै गाने−घञ् बहुगीयमानं परमात्मानम् (उपासते) सेवन्ते ॥
