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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
ब्रह्म विद्या का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (देवाः) सूर्यादि देवताओं ने (पुनः) निश्चय करके (वै) ही (अददुः) दान किया है और (मनुष्याः) मनुष्यों ने (पुनः) निश्चय करके (अददुः) दान किया है। (सत्यम्) सत्य (गृह्णानाः) ग्रहण करते हुए (राजानः) राजा लोगों ने (ब्रह्मजायाम्) ब्रह्मविद्या को (पुनः) अवश्य (ददुः) दिया है ॥१०॥
भावार्थभाषाः - मनुष्य परस्पर सत्संग, राजनियम, और सूर्य आदि पदार्थों के विवेक से ब्रह्मविद्या का दान करते आये हैं, इसी प्रकार सब को करना चाहिये ॥१०॥
टिप्पणी: १०−(पुनः वै) अवश्यमेव (देवाः) सूर्यादयो लोकाः (अददुः) अदुः। दत्तवन्तः (पुनः) (मनुष्याः) (अददुः) (राजानः) ऐश्वर्यवन्तः (सत्यम्) याथातथ्यम् (गृह्णानाः) स्वीकुर्वाणाः (ब्रह्मजायाम्) म० २। वेदविद्याम् (पुनः) अवश्यम् (ददुः) दत्तवन्तः ॥
