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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
पुरुषार्थ का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (यदि) जो तू (नववृषः) नव [अर्थात् नव द्वारवाले शरीर] से ऐश्वर्यवान् (असि) है.... म० १ ॥९॥
भावार्थभाषाः - शरीर में दो कान, दो आँखें, दो नथने, एक मुख, एक पायु, एक उपस्थेन्द्रिय नव छिद्र वा द्वार हैं, यथा, नवद्वारपुरे देही−गीता अ० ५ श्लो० १३। मनुष्य शरीर की शुद्धि रखने और उससे कष्ट सहने से ऐश्वर्यवान् हों ॥९॥
टिप्पणी: ९−(नववृषः) नवद्वारपुरेण शरीरेण ऐश्वर्यवान्। नवद्वारपुरे देही−गीता, अ० ५ श्लो० १३। द्वे श्रोत्रे, चक्षुषी नासिके च मुखमेकमिति ऊर्ध्वस्थानि सप्त, द्वे पायूपस्थेऽधः, इति नव छिद्ररूपाणि शरीरद्वाराणि ॥
