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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
पुरुषार्थ का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (यदि) जो तू (एकादशः) ग्यारहवाँ [पूर्वोक्त दस से भिन्न पुरुषार्थहीन] (असि) है, (सः) वह तू (अपोदकः) वृद्धि सामर्थ्य रहित (असि) है ॥११॥
भावार्थभाषाः - जो मनुष्य पूर्वोक्त दस मन्त्रों में कहे पुरुषार्थों को नहीं करता, वह पुरुषार्थहीन अपनी और दूसरों की वृद्धि नहीं कर सकता ॥११॥
टिप्पणी: ११−(एकादशः) तस्य पूरणे डट्। पा० ५।२।४८। इति एकादशन्−डट्। एकादशानां पूरणः। पूर्वमन्त्रोक्तेभ्यो दशभ्यो भिन्नः पुरुषार्थहीनः (असि) (सः) स त्वम् (अपोदकः) अपगतमुदकं सेचनसामर्थ्यं यस्मात् सः। अरसः। निर्वीर्यः ॥
