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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
शत्रु के विनाश का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (यदि वा) चाहे (देवकृता) गतिशील सूर्य आदि लोकों द्वारा की गयी (यदि वा) चाहे (पुरुषैः) पुरुषों से (कृता) की गयी (असि) तू है। (ताम् त्वा) उस तुझ को (पुनः) फिर (वयम्) हम (इन्द्रेण) ऐश्वर्य के साथ (सयुजा) समान संयोग से (नयामसि) लिये चलते हैं ॥७॥
भावार्थभाषाः - मनुष्य पुरुषार्थपूर्वक आधिदैविक, आधिभौतिक तथा आध्यात्मिक विपत्तियों का प्रतिकार करें ॥७॥
टिप्पणी: ७−(यदि) (वा) (असि) (देवकृता) दिवु गतौ−पचाद्यच्। गतिशीलैः सूर्यादिलोकैः कृता (यदि वा) (पुरुषैः) मनुष्यैः (कृता) निष्पादिता (ताम्) (त्वा) (पुनः) (नयामसि) गमयामः (इन्द्रेण) ऐश्वर्येण (सयुजा) सम्पदादित्वात् क्विप्। समानसंयोगेन सह (वयम्) पुरुषार्थिनः ॥
