0 बार पढ़ा गया
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
शत्रु के विनाश का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (कृत्याम्) हिंसा को (कृत्याकृते) हिंसाकारी के लिये (हस्तगृह्य) हाथ में लेकर (पुनः) अवश्य (परा नय) दूर लेजा। (अस्मै) इस पुरुष के लिये (समक्षम्) सामने (आ धेहि) रख दे, (यथा) जिससे [वह पुरुष] (कृत्याकृतम्) हिंसाकारी को (हनत्) मारे ॥४॥
भावार्थभाषाः - मनुष्य हिंसा आदि कर्मों को इस प्रकार त्याग दे, जैसे उपद्रवी को हाथ पकड़ कर निकाल देते हैं ॥४॥
टिप्पणी: ४−(पुनः) अवधारणे (कृत्याम्) हिंसाम् (कृत्याकृते) हिंसाकारिणे (हस्तगृह्य) नित्यं हस्ते पाणावुपयमने। पा० १।४।७७। इति हस्तस्य गतित्वे सति ल्यप्। हस्ते गृहीत्वा (परा) दूरे (नय) प्रेरय (समक्षम्) अव्ययीभावे शरत्प्रभृतिभ्यः। पा० ५।४।१०७। इति सम्+अक्षि−टच्। अक्ष्णोः समीपे। सन्मुखे (अस्मै) पुरुषाय (आ धेहि) स्थापय (यथा) यस्मात् (कृत्याकृतम्) हिंसाकारिणम् (हनत्) हन्यात् ॥
