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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
शत्रु के विनाश का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (रिश्यस्य) हिंसक के (परिशासम्) हिंसासामर्थ्य को (इव) अवश्य (त्वचः परि) उसके चर्म वा शरीर से (परिकृत्य) काट डालकर, (देवाः) हे विद्वानों ! (कृत्याकृते) हिंसा करनेवाले के लिये (कृत्याम्) हिंसा को (निष्कम् इव) तलछट के समान (प्रति मुञ्चत) फेंक दो ॥३॥
भावार्थभाषाः - मनुष्य दुष्कर्म को मूलसहित निकम्मी वस्तु के समान त्यागें ॥३॥
टिप्पणी: ३−(रिश्यस्य) रिश हिंसायाम्−क्यप्। हिंसकस्य (इव) अवधारणे (परिशासम्) शसु हिंसायाम्−घञ्। हिंसासामर्थ्यम् (परिकृत्य) कृती छेदने−ल्यप्। परिच्छिद्य (परि) सर्वतः (त्वचः) चर्मणः। शरीरादित्यर्थः (कृत्याम्) हिंसाम् (कृत्याकृते) हिंसाकारिणे (देवाः) हे विद्वांसः (निष्कम्) नौ सदेर्डि च। उ० ३।४५। इति षद्लृ विशरणगत्यवसादनेषु−कन्, सच डित्। निषदनम्। किट्टम् (इव) यथा (प्रति) प्रतिकूलम् (मुञ्चत) त्यजत ॥
