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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
शत्रु के विनाश का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (द्यावापृथिवी) हे सूर्य और पृथिवी ! (सा) वह (कृत्या) शत्रुनाशक सेना (तम्) चोर (प्रति) पर (इष्वाः) बाण से (ऋजीयः) अधिक सीधी (पततु) गिरे और (पुनः) फिर (तम्) उस (कृत्याकृतम्) हिंसाकारी को (मृगम् इव) आखेट पशु के समान (गृह्णातु) पकड़ लेवे ॥१२॥
भावार्थभाषाः - मनुष्य आकाश और पृथिवी मार्ग से प्रबल सेना द्वारा शत्रुओं को मारें ॥१२॥
टिप्पणी: १२−(इष्वाः) बाणात् (ऋजीयः) ऋजु−ईयसुन्। ऋजुतरम्। अधिकसरलम् (पततु) अधः पततु (द्यावापृथिवी) हे द्यावापृथिव्योः पदार्थाः (तम्) तर्दकं चोरम् (प्रति) (सा) (तम्) पूर्वोक्तम् (मृगम्) आखेटपशुम् (इव) यथा (गृह्णातु) आदत्ताम् (कृत्या) शत्रुनाशिका सेना (कृत्याकृतम्) हिंसाकारिणम् (पुनः) पश्चात्। अवश्यम् ॥
