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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
दोषनिवारण के लिये उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (गिरेः) पहाड़ के (अवचरन्तिका) नीचे घूमनेवाली (कर्णा) कानवाली (श्वावित्) साही (तत्) यह (अब्रवीत्) बोली, (याः काः) जो कोई (च) (इमाः) यह सब (खनित्रिमाः) खनती में रहनेवाली [साँपिनी] हैं, (तासाम्) उनका (विषम्) विष (अरसतमम्) अत्यन्त निर्बल होवे ॥९॥
भावार्थभाषाः - मनुष्य अपने हृदय की कुवासनाओं को नष्ट करे, जैसे बनैले जन्तुओं के विष को ॥९॥
टिप्पणी: ९−(कर्णा) कर्ण−पचाद्यच्। कर्णयुक्ता (श्वावित्) शुना आविध्यते श्वन्+आ−व्यध ताडने−क्विप्। शल्यकी (तत्) (अब्रवीत्) अकथयत् (गिरेः) शैलस्य (अवचरन्तिका) चर−शतृ, ङीप्, स्वार्थे कन्, टाप्। अधोभागे चरणशीला (याः) (काः) (च) पादपूरणे (इमाः) (खनित्रिमाः) राशदिभ्यां त्रिप्। उ० ४।६७। इति खनु विदारणे−त्रिप्, इडागमः। खनित्रिं मायते। माङ् माने−क। खनित्रौ गर्ते मानशीला निवासशीलाः। सर्पिण्यः (तासाम्) सर्पिणीनाम् (अरसतमम्) अतिशयेन निर्बलम् (विषम्) सरलम् ॥
