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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
दोषनिवारण के लिये उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (उरुगूलायाः) बहुत डसनेवाली [साँपिनी] की (दुहिता) पुत्री, (असिक्न्या) उस काली [नागिनी] से (जाता) उत्पन्न हुई (दासी) डसनेवाली [साँपिनी] है। (सर्वासाम्) सब (दद्रुषीणाम्) दद्रु अर्थात् दुर्गति वा खुजली देनेवाली [साँपिनों] (प्रतङ्कम्) जीवन को कष्ट देनेवाला (विषम्) विष (अरसम्) निर्बल है ॥८॥
भावार्थभाषाः - जैसे सद्वैद्य की ओषधि से सर्प आदि का विष निष्फल होता है, वैसे ही मनुष्य सद्ज्ञान से कुवासनाओं की कुचालें मिटावें ॥८॥
टिप्पणी: ८−(उरुगूलायाः) उरु+गूरी हिंसागत्योः−क, टाप्। रस्य लः। बहुहिंसिकायाः सर्पिण्याः (दुहिता) पुत्री (जाता) उत्पन्ना (दासी) दास हिंसायाम्−घञ्, ङीप्। हिंस्रा (असिक्न्या) अ० १।२३।१। असितवर्णया कृष्ण्या सर्पिण्या (प्रतङ्कम्) प्र+तकि कृच्छ्रजीवने−घञ्। कृच्छ्रजीवनकरम् (दद्रुषीणाम्) मृगय्वादयश्च। उ० १।३७। इति दरिद्रा दुर्गतौ−कु, रि आ इत्येतयोर्लोपः। यद्वा। कुर्भ्रश्च। उ० १।२२। इति दॄ विदारणे−कु। अन्येष्वपि दृश्यते। पा० ३।२।१०१। इति षणु दाने−ड, गौरादित्वात् ङीष्। दद्रूणां दुर्गतीनां विदारणानां वा दात्रीणां सर्पिणीनाम् (सर्वासाम्) सकलानाम् (अरसम्) असमर्थम् (विषम्) हलाहलः ॥
