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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
ब्रह्म की उत्तमता का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - [हे ब्रह्म !] (मे) मेरे लिये तू (अश्मवर्म) पत्थर के घर [के समान दृढ़] (असि) है। (यः) जो (अघायुः) बुरा चीतनेवाला मनुष्य (दिशाम्) दिशाओं के (अन्तर्देशेभ्यः) मध्यदेशों से (मा) मुझ पर (अभिदासात्) चढ़ाई करे, (सः) वह दुष्ट (एतत्) व्यापक दुःख (ऋच्छात्) पावे ॥७॥
भावार्थभाषाः - मन्त्र १। के समान ॥७॥
टिप्पणी: ७−(दिशाम्) दिशानाम् (अन्तर्देशेभ्यः) अन्तरालेभ्यः ॥
