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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
ब्रह्म की उत्तमता का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - [हे ब्रह्म !] (मे) मेरे लिये तू (अश्मवर्म) पत्थर के घर [के समान दृढ़] (असि) है। (यः) जो (अघायुः) बुरा चीतनेवाला मनुष्य (प्राच्याः) पूर्व वा सन्मुखवाली (दिशः) दिशा से (मा) मुझ पर (अभिदासात्) चढ़ाई करे, (सः) वह दुष्ट (एतत्) व्यापक दुःख (ऋच्छात्) पावे ॥१॥
भावार्थभाषाः - सर्वव्यापक ब्रह्म प्रत्येक दिशा में दुष्टों को सर्वत्र दण्ड देकर शिष्टों की रक्षा करता है। इसी प्रकार आगे समझो ॥१॥
टिप्पणी: १−(अश्मवर्म) वर्म गृहनाम−निघ० ३।४। अश्मनः पाषाणस्य गृहमिव दृढं ब्रह्म (मे) मह्यम् (असि) भवसि (यः) (मा) माम् (प्राच्याः) अ० ३।२६।१। पूर्वायाः। अभिमुखीभूतायाः (दिशः) दिशायाः (अघायुः) अ० १।२०।३। पापेच्छुः (अभिदासात्) अभिक्षिपेत् (एतत्) एतेस्तुट् च। उ० १।१३३। इति इण् गतौ-अदि, तुट् च। व्यापकं दुःखम् (सः) अघायुः (ऋच्छात्) ऋच्छ गतौ-लेट्। प्राप्नुयात् ॥
