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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
ब्रह्मविद्या का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (आञ्जन) हे संसार के व्यक्त करनेवाले ब्रह्म ! तेरे (इदम्) परम ऐश्वर्य को (विद्वान्) जानता हुआ मैं (सत्यम्) सत्य (वक्ष्यामि) बोलूँगा, (अनृतम्) असत्य (न) नहीं। (पूरुष=पुरुष) हे सबके अगुआ पुरुष, परमेश्वर ! (तव) तेरे [दिये हुए] (अश्वम्) घोड़े, (गाम्) गौ वा भूमि और (आत्मानम्) आत्मबल को (अहम्) मैं (सनेयम्) सेवन करूँ ॥७॥
भावार्थभाषाः - मनुष्य परमेश्वर की महिमा देखकर सदा सत्य ही बोले और पुरुषार्थपूर्वक सब पदार्थों से उपकार लेवे ॥७॥ इस मन्त्र का उत्तरार्ध ऋ० १०।९७।४। और यजु० १२।७८। में इस प्रकार है−स॒नेय॒मश्वं॒ गां वास॑ आ॒त्मानं॒ तव॑ पूरुष ॥ हे पुरुष ! तेरे [दिये हुए] घोड़े, गौ वा भूमि वस्त्र और आत्मबल को सेवन करूँ ॥
टिप्पणी: ७−(इदम्) इन्देः कमिन्नलोपश्च। उ० ४।१५७। इति इदि परमैश्वर्य्ये कमिन्, नलोपः। परमैश्वर्यम्। महाप्रभुताम् (विद्वान्) अ० २।१।२। विद ज्ञाने-शतृ। वसुरादेशः। जानन् (सत्यम्) यथार्थम् (वक्ष्यामि) वच-लृट्। वदिष्यामि (न) नहि (अनृतम्) असत्यम् (सनेयम्) षण सम्भक्तौ-लिङ्। संभजेयम् (अश्वम्) हयम् (गाम्) धेनुं भूमिं वा (अहम्) उपासकः (आत्मानम्) अ० १।१८।३। आत्मबलम्। पुरुषार्थम् (तव) तव प्रसादात् (पूरुष) म० २। छान्दसो दीर्घः। हे अग्रगामिन् परमात्मन् ॥
