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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
राजतिलक यज्ञ का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - [हे राजन् !] (त्वा) तुझको (दिव्याः) दिव्य (पयस्वतीः=०-त्यः) सारयुक्त (आपः) जलधाराओं ने (वर्चसा) अपने बलदायक सार से (अभि असिचन्) सब प्रकार सींचा है, (यथा) जिससे तू (मित्रवर्धनः) मित्रों की वृद्धि करनेवाला (असः) होवे। (सविता) सर्वप्रेरक परमेश्वर (त्वा) तुझको (तथा) वैसे गुणवाला [जैसा जल] (करत्) करे ॥६॥
भावार्थभाषाः - अभिषेक के उपरान्त सब लोग आशीर्वाद दें, हे राजन् ! तुझे यह अभिषेक वा स्नान इसलिये कराया है कि जैसे जल अन्न आदि उत्पन्न करके संसार का उपकार करता है, वैसे ही सर्वप्रेरक परमेश्वर के अनुग्रह से तू प्रजाप्रेरक होकर अपने हितैषी जनों की सदा उन्नति करता रहे ॥६॥
टिप्पणी: ६−(अभि असिचन्) षिच क्षरणे, सेके-लुङ्। अभिषेकयुक्तं कृतवत्यः (त्वा) राजानम् (वर्चसा) स्वकीयेन सारेण (आपः) (दिव्याः) (पयस्वतीः) पयस्वत्यः। सारवत्यः (यथा) येन प्रकारेण (असः) अस्तेर्लेटि अडागमः। त्वं भवेः (मित्रवर्धनः) म० २। मित्राणां वर्धयिता (तथा) तेन प्रकारेण। जलवत्स्वभावेन (सविता) सर्वप्रेरको देवः परमेश्वरः (करत्) लेट्। कुर्यात् ॥
