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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
राजतिलक यज्ञ का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - [हे राजन् !] (उग्रः) तेजस्वी, (चेत्ता) चैतन्य स्वभाव और (सपत्नहा) शत्रुनाशक तू (अभि) सब ओर से (प्रेहि) आगे बढ़, (मा अप वेनः) पीछे न हट। (मित्रवर्धन) हे मित्रों के बढ़ाने हारे ! (आतिष्ठ) [सिंहासन वा हाथी आदि पर] आकर बैठ। (देवाः) विजय चाहनेवाले वीर विद्वानों ने (तुभ्यम्) तेरे लिये (अधि ब्रुवन्) यह अनुग्रहवचन दिया है ॥२॥
भावार्थभाषाः - (देवाः) मुख्य-मुख्य शूर विद्वान् लोग राजा को सहाय वचन के साथ अभिनन्दन करके राजसिंहासन और हाथी आदि यान पर बिठलावें और (मित्रवर्धन) राजा माननीय पुरुषों का आदर-मान करे ॥२॥
टिप्पणी: २−(अभि) अभितः सर्वतः (प्रेहि) प्रगच्छ (मा अप वेनः) वेनतिः कान्तिकर्मा-निघ० २।६। गतिकर्मा०-२।१४। अर्चतिकर्मा-३।१४। माप गच्छ (उग्रः) तीव्रस्वभावः (चेत्ता) चिती संज्ञाने-तृन्। चेतिता। ज्ञानवान् (सपत्नहा) अ० १।२९।५। शत्रूणां हन्ता (आतिष्ठ) राजासनं हस्त्यश्वादियानं च आरोह (मित्रवर्धन) नन्दिग्रहिपचादि०। पा० ३।१।१३४। इति वृधेर्ण्यन्तात्-ल्यु। हे मित्राणां वर्धयितः (तुभ्यम्) (देवाः) विजिगीषवो विद्वांसः (अधि ब्रुवन्) ब्रूञ् व्यक्तायां वाचि-लङ्। अधि अब्रुवन्। अधि-वचनम् अनुग्रहवचनम् उच्चारितवन्तः ॥
