0 बार पढ़ा गया
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
विष नाश करने का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (आचितम्) एकत्र हुए (ग्रामम् इत्) जनसमूह [शत्रु वृन्द] के समान [तुझको] (वचसा) वचनमात्र से (परिस्थापयामसि=०-मः) हम घेरते हैं। (वृक्षः इव) वृक्ष के समान (स्थाम्नि) अपने स्थान पर (तिष्ठ) ठहर। (अभ्रिखाते) हे कुद्दाल से खोदी हुई ! तूने (न) नहीं (रूरुपः) मूर्छित किया है ॥५॥
भावार्थभाषाः - विद्वान् वैद्य विचारपूर्वक उपाय के साथ विष को प्रभावरहित करके निकाल देते हैं, जैसे शूर पुरुष शत्रुसेना को घेरकर हरा देते हैं ॥५॥
टिप्पणी: ५−(परि) परितः सर्वतः (ग्रामम्) ग्रसेरा च। उ० १।१४३। इति ग्रस ग्रहणे, भक्षणे-मन्, धातोराकारः। जनसमूहम्। शत्रुवृन्दम् (इव) यथा (आचितम्) आङ्+चि-क्त। आकीर्णम्। व्याप्तम् (वचसा) वचनमात्रेण (स्थापयामसि) दध्मः (तिष्ठ) स्थिता भव (वृक्ष इव) यथा वृक्षो निश्चलो भूत्वा (स्थाम्नि) सर्वधातुभ्यो मनिन् उ० ४।१४५। इति ष्ठा गतिनिवृत्तौ-मनिन् स्वस्थाने। मूले (अभ्रिखाते) सर्वधातुभ्य इन् उ० ४।११८। इति अभ्र गतौ-इन् अपादाने। अभ्रिः काष्ठकुद्दालः। तीक्ष्णाग्रो लोहदण्डः। खन विदारे-क्त। हे खननसाधनेन विदारिते ओषधे (न) नहि (रूरुपः) म० ३। अमूमुहः ॥
