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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
विष नाश करने का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (प्राच्यम्) पूर्व वा सन्मुख दिशा का (विषम्) विष (अरसम्) अरस होवे, और (यत्) जो (उदीच्यम्) उत्तर वा बायीं दिशा में हैं [वह भी] (अरसम्) अरस होवे। (अथ) और (इदम्) यह (अधराच्यम्) नीचे की दिशा का [विष] (करम्भेण) जलसेचन से [वा दही मिले सत्तुओं से] (विकल्पते) असमर्थ हो जाता है ॥२॥
भावार्थभाषाः - चिकित्सक लोग विष और विषैले रोगों को यथावत् जलसेचन से अथवा सत्तुओं के प्रयोग से हटावें ॥२॥ (करम्भ) शब्द का अर्थ जलक्रिया वा जलसेचन का और दही सत्तुओं का है [करम्भो दधिसक्तवः-इत्यमरः, १९, ४८] ॥
टिप्पणी: २−(अरसम्) नीरसम्। निष्प्रभावम्, भवतु (प्राच्यम्)) द्युप्रागपागुदक्प्रतीचो यत्। पा० ४।२।१०१। इति प्राच्-यत्। पूर्वोद्भवम् (स्वाभिमुखदिशि भवम्) (यत्) यद् विषमस्ति तदपि (उदीच्यम्) उदच्-यत् पूर्ववत्। उत्तरदिशि भवम् वामदिशि भवम् (अथ) अनन्तरम् (इदम्) (अधराच्यम्) अधराच्-यत्। अधस्ताद् वर्तमानायां दिशि भवम्। (करम्भेण) अकर्तरि च कारके संज्ञायाम्। पा० ३।३।१९। इति क+रभि शब्दे, अत्र सेके-घञ्। रभेरश्च लिटोः। पा० ७।१।६३। इति नुम्। केन जलेन रभ्यते सिच्यते मिश्रीक्रियते वा स करम्भः तेन, जलसेचनकर्मणा। यद्वा दधिमिश्रितशक्तुभिः (विकल्पते) कृपू सामर्थ्ये। कृपो रो लः। पा० ८।२।१८। इति लत्वम्। विगतसामर्थ्यं भवति ॥
