शत्रु के नाश करने का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (जातवेदः) हे ज्ञानवान् परमेश्वर ! (ये) जो लोग (दिशाम्) दिशाओं के (अन्तर्देशेभ्यः) मध्य देशों से (सर्वाभ्यः) सब (दिग्भ्यः) दिशाओं से (अस्मान्) हमको (जुह्वति) खाते और (अभिदासन्ति) चढ़ाई करते हैं। (ते) वे (ब्रह्म) [तुझ] ब्रह्म को (ऋत्वा) पाकर (पराञ्चः) पीठ देते हुए (व्यथन्ताम्) व्यथा में पड़ें। (एनान्) इनको (प्रतिसरेण) [तुझ] अग्रगामी के साथ (प्रत्यक्) उलटा (हन्मि) मैं मारता हूँ ॥८॥
भावार्थभाषाः - मनुष्य उस सर्वनियन्ता परब्रह्म का आश्रय लेकर विचारपूर्वक अपने सब विघ्नों का नाश करके आनन्द भोगें ॥८॥ इत्यष्टमोऽनुवाकः ॥ इति नवमः प्रपाठकः ॥ इति चतुर्थं काण्डम् ॥ इति श्रीमद्राजाधिराजप्रथितमहागुणमहिमश्रीसयाजीरावगायकवाडाधिष्ठितबड़ोदेपुरीगतश्रावणमास- परीक्षायाम् ऋक्सामाथर्ववेदभाष्येषु लब्धदक्षिणेन श्रीपण्डितक्षेमकरणदासत्रिवेदिना कृते अथर्ववेदभाष्ये चतुर्थकाण्डं समाप्तम् ॥